Azadirachta indica (Neem), a divine tree: Is chewing Neem leaves safe?
Video link: https://youtu.be/6LVMHhPm1-0
नीम, एक दैवीय वृक्ष: क्या इसकी पत्तियों को खाना-चबाना सुरक्षित है?
DOI: 10.31080/ASMI.2022.05.1154
https://actascientific.com/ASMI/pdf/ASMI-05-1154.pdf
आयुर्वेद में नीम मुख्य औषधीय वृक्षों में शिरमौर है. संस्कृत में ‘अरिष्ट’ और वानस्पतिक शास्त्र में Azadiracta Indica कहा जाता है. इसके विभिन्न भाषाओँ में और भी कई नाम हैं परन्तु मार्गोसा या इससे मिलते-जुलते नाम ज्यादा प्रचलित हैं (in Arabic, مارجوزا-Marjuza; Burmese, မာဂိုဆာ-Mar Go Sar; Chinese simple, Chinese traditional, 玛格萨-Mǎ Gé Sà; and just Margosa in Afrikaans, Amharic, Albanian, Armenian, Azerbaijani, Bengali, Bulgarian, Croatian, Czech, Danish, Dutch. English, Esperanto). इसमें ऐसे औषधीय गुण है जो कई बिमारियों जैसे एलर्जी, डायबिटीज, कैंसर, चर्म रोगों, और बवासीर से लड़ने में सहायक होते है. नीम के औषधीय गुणों के कारण इसे भारत और विश्व के दूसरे भागों में एक दैवीय वृक्ष की तरह सम्मान दिया जाता है, इसकी पूजा तो अक्सर नहीं होती परन्तु सम्मान बहुत है.
कहते हैं एक बार हकीम लुकमान ने अपने एक शिष्य को ऋषि चरक के पास एक पत्र लेकर इस सलाह के साथ भेजा कि जाते समय वह सिर्फ इमली के वृक्ष कि छाया में ही सोये या आराम करते हुए जाए. जब शिष्य चरक मुनि के पास पहुंचा उसका शरीर चर्म रोगो से विकृत हो चुका था, उसने लुकमान का पत्र चरक को दिया परन्तु पत्र में कुछ नहीं लिखा था. चरक तुरंत ही रहस्य समझ गए और पत्रवाहक से उसकी सेहत और यात्रा के बारे में पूँछा, पत्रवाहक ने अपनी राम कहानी सुनाई और जब बताया कि हकीम साहिब के हुक्म के अनुसार वह सिर्फ इमली के पेड़ के नीचे ही रुकता हुआ पहुंचा है. चरक ऋषि ने तुरंत एक पत्र पत्रवाहक को देकर कहा कि वह जाते समय सिर्फ नीम के वृक्ष की छाया में ठहरे और सोये. पत्रवाहक जब हकीम लुकमान के पास पहुंचा तो हकीम साहिब आश्चर्य चकित रह गए और पत्रवाहक से उसकी कहानी पूंछने के बाद कहा, नीम! माशा-अल्लाह!
पूर्व में प्रकाशित शोधों से विदित होता है कि नीम की पत्तियों, टहनियों, तेल, छाल, और बीजों में जीवाणुनाशक, विषाणुनाशक, कवकनाशक, कीटनाशक, कर्क-रोग (कैंसर) नाशक तत्व बहुतायत में हैं और इनसे बहुत सी व्याधियों का उपचार किया जा सकता है. कहते हैं कि नीम कि कोमल पत्तियां चबाने से आपको मुख और दांतो के रोग के साथ ही डायबिटीज और कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति मिलती है.
बहुत से वैज्ञानिक आविष्कारों के बाद बार बार नीम के गुणों ने मनुष्य को चमत्कृत ही किया है और आज भी नीम कि महत्ता बरकरार है. परन्तु वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है, पर सबसे ज्यादा बदला वातावरण, जिसे मनुष्य के लालच की भूख ने इतना विकृत कर दिया कि उससे नीम भी अछूता नहीं रह सका.
पिछले कुछ वर्षों में मैंने नीम के कई जवान वृक्षों को बीमार होकर दम तोड़ते देखा है, अर्थात स्वास्थ्यदाता खुद अस्वस्थ हो गया है यही है प्रदूषित वातावरण. तब फिर आप खुद ही सोचिये कि जिस नीम कि मुलायम पत्तियां आप सुबह टहलते हुए राह में रास्ते के किनारे खड़े नीम से तोड़कर खाली पेट इस आशा से खाते हैं कि आप स्वस्थ हो जाएंगे क्या वे आज भी उतनी ही जीवाणुनाशक और स्वास्थ्यदाई हैं जैसा कि आयुर्वेद और दूसरे चिकित्सीय शास्त्रों में वर्णित है. कहीं ऐसा तो नहीं कि दूषित वातावरण ने उन्हें भी रोगवाहक बना दिया है ? इसी सन्दर्भ में हाल ही में प्रकाशित संदर्भित शोध में (https://actascientific.com/ASMI/pdf/ASMI-05-1154.pdf) यही जानने की कोशिश की गई कि नीम कि कोंपलों पर कौन-कौन से जीवाणु हैं और उनमें से कितने संभावित रोगकारक हैं और कितने स्वास्थयदायक हैं.
इस अध्ययन में नीम की कोमल पत्तियों के ११० नमूने उन स्थानों से लिए गए जहाँ लोग अक्सर स्वास्थ्यलाभ लेने के लिए प्रातः घूमने जाते हैं और नीम कि कोमल पत्तियां चबाते हैं और नीम कि दातुन भी करते हैं. और पूर्ण सावधानीपूर्वक उन नमूनों का उन पर उपस्थित जीवाणुओं की पहचान के लिए भारतीय पशु चिकित्सा विज्ञान संस्थान के जानपदिक रोग विभाग कि प्रयोगशाला में वर्ष २०२० में विश्लेषण किया गया. विश्लेषण से पता चला कि नीम की पत्तियों के सभी नमूनों में एक से अधिक प्रकार के जीवाणु मिले जो कि स्वाभाविक भी है. अध्ययन में ६३ प्रजातियों के ३५७ जीवाणु विलगित किये गए. सबसे ज्यादा नमूनों पर मिलाने वाले जीवाणुओं में मुख्य प्रकार उन जीवाणुओं के थे जो अक्सर रोगकारक होते हैं, इनमें थे, पैंटोइया एग्लोमेरैंस (३७, बहुत से रोग करता है और इसे खतरनाक जीवाणुरोधी दवाओं के लिए रेसिस्टेंट जीवाणुओं की श्रेणी में रक्खा गया है), हैफनिया अलवीआई (२०, सेप्टिक और सेप्टिसीमिया सहित बहुत से रोग करता है), एस्चेरीचिया कोलाई (११, दस्त, सेप्टिसीमिया सहित बहुत से रोग करता है),बैसिलस सीरियस (७, खाद्यजनित विषाक्तता का मुख्य कारण है), राउलटेल्ला टेरीजीना (७, दस्त, सेप्टिसीमिया सहित बहुत से रोग करता है), सेरेसिया ओडोरिफेरा और रूबीडीए (12, घावों में संक्रमण और सेप्टीसेमिया कारक है), एसिनेटोबैक्टर कैलकोएसीटिकस (५, घावों में संक्रमण और सेप्टीसेमिया कारक है) और एन्टेरोकोकस फिकेलिस (५, बताता है कि विष्ठा पर बैठने वाली मक्खियां संक्रमण फैला रही हैं). इनके अलावा भी बहुत से नमूनों पर और भी कई प्रकार के स्वास्थय के लिए हानिकारक जीवाणु उपस्थित पाए गए जैसे कि क्लेबसिएल्ला न्युमोनिअ, क्लेबसिएल्ला ऑक्सिटोका, ऐसीनेटोबैक्टर लोफी, ऐरोमोनास, अल्कलीजेनेस, सेडेसिया, स्यूडोमोनास, स्टेफाईलोकॉकस, स्टेनोट्रोफोमोनास मल्टोफ़िलिया और जीनोरैब्दास बोविएन्नी आदि जो बहुत से भयंकर रोगो का कारण माने गए हैं. रोगकारक जीवाणु और भी ज्यादा हानिकारक हो जाते हैं यदि वे जीवाणुरोधी औषधियों के लिए रेसिस्टेंट हो जाते हैं, नीम कि पत्तियों पर पाए गए ६८.६% जीवाणु पेनिसिलिन और सिफालोस्पोरिन समूह की दवाओं के प्रतिरोधी थे, २६ नीम की पत्तियों में सुपरबग प्रजाति के जीवाणु मिले, जिनपर कोई भी दवा असरकारक नहीं होती, अतः इनसे होने वाले इन्फेक्शन अक्सर मौत का पैगाम लेकर आते हैं.
इन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और अतिहानिकारक जीवाणुओं के रहते नीम की कोमल पत्तियों को बिना निरदूषित किये चबाना आपको कभी भी महंगा पड़ सकता है.
ऐसा नहीं है कि नीम कि पत्तियों पर सिर्फ मनुष्यों के रोगाणु ही उपस्थित थे, उनमें से १७ नमूनों में पौधों के लिए रोगकारक इर्विनिया समूह के जीवाणु भी पाए गए जो किसी भी वृक्ष को हमेशा के लिए मौत की नींद सुला सकते हैं. परन्तु अध्ययन से एक तथ्य यह भी उजागर हुआ कि पांच नीम की पत्तियों के नमूनों पर स्वास्थ्यवर्धक प्रोबॉयोटिक बैक्टीरिया भी मिले जो एक अच्छा संकेत है परन्तु ११० में से यदि स्वास्थ्यवर्धक जीवाणु सिर्फ ५ नमूनों में मिले तो कोई भी समझदार मनुष्य इस लाभ के लिए इतना बड़ा खतरा उठाने के लिए क्यों तैयार होगा?
अतः सभी नीम की पत्तियां खाने-चबाने वाले लोगों से अनुरोध है कि वे नीम की पत्तियां पेड़ों से तोड़कर सीधे ही ना प्रयोग करें परन्तु उन्हें प्रयोग करना यदि वास्तव में आवश्यक है तो उन्हें निरदूषित करके ही प्रयोग करें.
नीम की पत्तियों को निरदूषित करके कैसे प्रयोग करें: साफ़ पानी से धोने बाद, क्लोरीनयुक्त जल में १५-३० मिनट भिगोने बाद या फिर लाल दवा (पोटैशियम परमैंगनेट) के घोल से साफ़ करके ही प्रयोग करें नीम की पत्तियां.
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