Sunday, July 26, 2026

समय की कीमत (Value of Time)

 समय की कीमत

समय की कीमत अक्सर हमें परीक्षा के समय, बीमारी में, और मुश्किल में पता चलती है अन्यथा हम अक्सर समझते हैं कि मेरा समय सबसे कीमती है तुम्हारे पास बर्बाद करने के लिए बहुत समय है. समय ऐसी चीज है कि आपके पास जितनी ताकत होती है उसे बर्बाद करने में आपको उतना ही ज्यादा  मजा आता है, या मजे करने को ही आप समय की उपयोगिता मानते हैं, और उस समय आपके पास कोई कितने ही आवश्यक कार्य से आये आप उसे अहमियत नहीं देते बल्कि उसे समय की बर्बादी मानते हैं. आप (आम आदमी ) भारत के किसी सरकारी दफ्तर में जाओ (प्राइवेट कार्यालय में तो उनका काम होगा तभी आपसे बात हो पाएगी) ,और कोई काम के लिए कहो तो आपको अगली तारीख या इन्तजार करने को कहा जाएगा, परन्तु अगर आपके पास प्रशासनिक या पैसे या राजनैतिक या फिर बाहुबल (गुंडागर्दी)  की ताकत है तो आपका काम फटाफट हो जाएगा, लाइन में लगे लोगों से पहले. और इन ताकतवर लोगों की आदत हो जाती है अपने काम फटाफट करवाने की, इन्हे इन्तजार करना गवारा नहीं होता चाहे इन्हे ये भी पता ना हो कि उस कार्य के होने में समय भी लग सकता है. मुझे ये अनुभव कई बार हुए हैं क्योंकि मेरा काम था क्लिनिकल सैंपल को एनालिसिस करके सही रोग या सही दवा का चयन करके डाक्टर के लिए रिपोर्ट देना. 

एक बार (2001) बरेली के जिलाधिकारी की पत्नी को मूत्राशय संक्रमण था और उनका अर्दली मूत्र का नमूना लेकर आया जिसके साथ सन्देश भी था कि जाँच की रिपोर्ट हाथ के हाथ दें , मैंने अर्दली को कहा कि रिपोर्ट दो दिन बाद ही मिलेगी, तो अर्दली ने रौब दिखाया कि आपको अंदाजा भी है कि यह किसका सैंपल है, मैंने कहा की इस प्रयोगशाला में नाम का कोई उपयोग नहीं हैं सैंपल नंबर मायने रखता है. उसने तुरंत ही अपने साहब को फ़ोन लगाया और बात करने के बाद मुझे फ़ोन देकर कहा, अब बात करो, साहब ने छूटते ही कहा कि दो घंटे में रिपोर्ट दो नहीं तो आपका क्या होगा मुझे नहीं पता. मैंने कहा आप जिलाधिकारी हैं और मैं आपका हुक्म मानने के लिए बाध्य हूँ परन्तु मूत्र के नमूने में जो जीवाणु हो सकते हैं वे आपका हुक्म नहीं मानते, न वे मेरा आदेश मानेगे, वे तो अपनी ही गति चलते हैं अतः आप मेरे साथ जो करना चाहें करें परन्तु रिपोर्ट तो तीसरे दिन से पहले नहीं मिलेगी और हो सकता चार दिन या ज्यादा भी लग जाएँ. चाहे तो आप अपने सैंपल को आप किसी और प्रयोगशाला में भिजवा सकते हैं. 

एक बार और (२००३) बरेली के बिशप महोदय का मूत्र नमूना आया, उन्हें भी समझाना पड़ा कि जीवाणु मेरा, और उनका (भगवान के दूत) कहना नहीं मानते. 

पैसे वाले लोग तो अक्सर समझते हैं कि समय पैसे का गुलाम है और वे लोग अक्सर कोशिश करते हैं कि समय को पैसे से खरीदा जा सकता है और वे लोग अक्सर ज्यादा फीस और रिश्वत की पेशकश करते रहते थे जल्दी रिपोर्ट के लिए, नेता जी और बाहुबलियों की तो बात ही निराली होती है उनसे निबटना और उन्हें समझाना बहुत ही मुश्किल होता है कि बहुत से काम उनके हुक्म के नहीं समय के गुलाम होते हैं. 

आम इंसान के समय की कोई कीमत नहीं होती इसका पता लगाना हो या फिर समझाना हो तो आप भारतीय प्रशासन और भारतीय पुलिस, और भारतीय न्याय व्यवस्था (न्यायालयों) के पास जाएँ शायद आपकी मृत्य आपके समय को उनसे पहले पहचान ले . 

एक बार जब मैं एक डायरेक्टर था (२०१४, बागपत) अर्थात मेरे समय की भी कीमत थी मुझे दिल्ली कृषि  मंत्रालय में पशु-स्वास्थय संयुक्त सचिव महोदय ने 10 बजे मिलने को बुलाया और जब मैं पहुंचा तो एक घंटा इन्तजार करने को कहा, एक घंटे बाद पहुंचा तब फिर दो घंटे इन्तजार करने को कहा, दो घंटे बाद कहने लगे कि लंच टाइम हो रहा है तीन बजे आना, फिर मेरा सब्र टूटा और मैंने कहा कि अब मैं जा रहा हूँ और अगली बार मुझे तभी बुलाना जब आपके पास समय हो वर्ना मेरा समय बर्बाद करने का प्रयास मत करना उसकी कीमत आपके समय से ज्यादा है क्योंकि सरकार मुझे आपसे ज्यादा वेतन देती है, और मैं कार्यस्थल पर लौट गया. शायद यह साहब को नागवार गुजरा, कुछ दिन बाद कृषि मंत्रालय के सचिव ने मुझे शाम को तीन बजे मिलने के लिए बुलाया, और शायद सजा देने के लिए ही इंतजा करने को कहा, मैं वहीं उनके कार्यालय के असिस्टेंट के पास बैठ गया और हर 15 मिनट पर वहां से फ़ोन करवाया परन्तु वही इन्तजार करो, आखिर मैं 5 बजे उनके कार्यालय में उनके अस्सिटेंट के मना करने के बावजूद घुंस गया और देखा साहब झपकी ले रहे हैं, वापस आकर मैंने एक ईमेल सचिव और मंत्री महोदय को लिखा और बताया कि उन्होंने मेरा कितना समय, मेरे ड्राइवर का समय नष्ट किया है, उसकी कितनी सरकारी कीमत है, आने जाने में जो खर्चा और समय लगा उसका हिसाब बताकर कहा कि  आपने उच्च पद का दुरूपयोग करके सरकारी धन की कितनी हानि की है उसकी भरपाई आपका कर्तव्य बनता है. उसके बाद मुझे कभी किसी ने फालतू नहीं  बुलाया, और बुलाया तो 5 मिनट से ज्यादा इंतजार नहीं कराया. 

और आजकल जबकि मैं सेवानिवृत्त हूँ मेरे समय की कोई कीमत नहीं है फिर भी पता नहीं क्यों न्यायालय समझता कि मेरा समय बर्बाद करके वह कुछ बड़ा कर रहा है, चलो जज महोदय को भी समझने दो कि वे बड़े शक्तिशाली हैं और उन्हें मेरा और मेरे जैसे लोगो का समय (जिसकी कीमत पता नहीं क्या है) बेकार करने की स्वतंत्रता है. कभी कभी लगता है कि जब हमें अपने ताकत के नशे में लगता है कि औरों के समय की कोई कीमत नहीं है तब शायद हम अपना ही समय व्यर्थ कर रहे होते हैं.  

सन्देश: आपको अपने समय की कीमत स्वयं निश्चित करनी होती है (तभी संभव है यदि आपके पास कोई ताकत है, अन्यथा आपकी कीमत कोई नहीं आंकेगा), यदि आप आम आदमी है तो मैं इतना ही कहूंगा कि बंद कर दो आम आदमी होना या फिर इंसान होना. 

यह भारत है, है मिट्टी का भी मोल यहाँ, इंसान की कीमत कोई नहीं.