Saturday, May 30, 2026

मरने की ख्वाहिश थी फिर भी मैं जी गया

मरने की ख्वाहिश थी फिर भी मैं जी गया 

मरने की ख्वाहिश थी हर पल, हर दिन, कितने ही साल से, 

फिर भी न जाने मैं, क्यों इतने साल सिद्दत से जी गया.

दर्द तो बहुत दिए थे जो जिंदगी ने हर कदम पर, 
पर हर दर्द को मैं मरने की ख्वाहिश मे पी गया.
दुश्मनों को भी दोस्त समझता रहा बहुत दिन क्योंकि, 
जानता था मरे हुए को मार कर कभी क्या कौन ले गया.
सच में मरे हुए मुझे एक अरसा गुजर गया,
फिर जाने क्यों मैं इतने साल मर मर के जी गया.
मुर्दे भी हंसते और मुस्कुराते हैं अब मुझे पूरा यकीन है, 
तभी तो मैं इस तरह मुस्कुरा कर हँस-हँस के जी गया.
लोग कहते हैं इस तरह जिंदगी एक ख्वाब है,
और मैं हूं कि इस ख्वाब को मर मर के जी गया.
कभी खुशी कभी गम कभी घबरा के पी गया, 
जीना नहीं था एक पल फिर कैसे बरसों मैं जी गया.
किसी और की नहीं थी औकात जो जख्म दे-दे मुझे,
और जो अपनों ने दिए जख्म उन्हें भी हँस-हँस  सी गया.
क्या इसी को जीना कहते हैं यही सोचता हूं हर वक्त, 
हर बार मरने की जगह मैं कुछ साल और जी गया.
जिंदगी मुझे तेरी जरूरत नहीं थी दो कदम भी, 
पर मरने की आरजू में मैं तुझको भी हँस-हँस जी गया.
दुनिया कहती है जहर खा के मर जाओ,
पर क्या करूं मैं तो जहर पी के भी इतने साल जी गया.
हर रोज मैं अपनों के दिए जहर पीता रहा मुसल्सल,
जाने वो कैसा जहर था  कि मैं मर मर के जी गया.
मौके और  बहाने बहुत थे मरने और जीने के भी,
रोज मरने की चाह में मैं मौके और  बहाने को जी  गया.
जिंदगी तो जहर थी, और मेरी तो मरने की आरजू थी, 
जहर भी क्या पीने की चीज थी जो इतनी शिद्दत से पी गया.
दवा के नाम पर हर रोज बिकता है जहर मेरे देश में, 
कितनी गोलियां खायीं फिर भी बेतरह बेकार में जी गया.