Saturday, December 27, 2025

जियें तो जियें क्यूँ?

 जियें तो जियें क्यूँ?

जब जीने का सलीक़ा आया तब तक ज़िन्दगी की शाम आ चुकी है और मन बार बार यह सवाल करने लगा है कि जीएं तो जीएं क्यूँ. यह प्रश्न ऐसा नहीं कि पहली बार मैंने या किसी ने अपने आप से पूँछा है या पूँछा होगा. यह प्रश्न सास्वत है हमेशा से रहा है और रहेगा. इस प्रश्न का उत्तर तलाशते कितने दार्शनिक कितने आम लोग इस संसार में आये और चले गए परन्तु प्रश्न सुलझा नहीं उलझता गया. वैसे मैं भी इस प्रश्न को हल करने के लिए यह प्रश्न अपने आप से नहीं पूँछ रहा हूँ यदि ऐसा होता तो मैं भी बुद्ध और नानक की तरह इसके उत्तर की तलाश में बहुत पहले निकल चुका होता क्योंकि प्रश्न तो सास्वत है, मेरे मेरे मन भी दशकों से है पर इतना उग्र होकर कभी नहीं खड़ा था जितना कि आज. क्या मैं इसलिए जी रहा हूँ कि मेरे बग़ैर ये दुनिया अधूरी है, सूनी हो जायेगी, या फिर रुककर मेरा इंतज़ार करेगी, या फिर मैं इस दुनिया में कोई नया चाँद या सूरज उगाने वाला हूँ, या फिर मैं कुछ ऐसा करने वाला हूँ कि दुनिया में कुछ ऐसा करूँगा कि दुनिया बदल जायेगी? मेरे आने से पहले भी दुनिया थी, मेरे जाने के बाद भी रहेगी, अर्थात मेरे होने न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता. अगर इस संसार में तथाकथित पैगम्बर, भगवान्, देवियां, देवता, प्रभुपुत्र, मनु, नानक, बुद्ध और भी जाने कितने अवतारी पुरुष-स्त्रियां या फिर सामान्य मानव ना आये होते तब क्या यह दुनिया ना होती? तब भी होती परन्तु शायद ऐसी ना होती. इस संसार में शायद मैं मैं ना होता आप आप न होते, परन्तु दुनिया होती तो अवश्य, संसार में इतना कुछ अवाल-बवाल  है जिसका ना पहले पता था, ना अब पता है ,और जितना जानने की कोशिश होती रही उतना ही जटिल यह सवाल और बवाल होता जाता है. तो यह नहीं तो कोई दुनिया अवश्य ही होती क्योंकि इस संसार में रहने, जीने और मरने वालों को, या फिर किसी को भी नहीं पता कि दुनिया है क्यों, यह सब है ही क्यों. शायद इस सवाल को अपने आप से पूंछते रहे कबीर ने यह लिखा था, "सुखिया सब संसार है, खाये और सोये. दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये".

  मेरे सोचने न सोचने से इस प्रश्न (मैं क्या हूँ, क्यों हूँ, जीता हूँ कि मरता हूँ, सोता हूँ  कि जगता हूँ, कुछ करता भी हूँ कि बस यूँ ही हूँ) के हल होने की संभावना उतनी भी नहीं जितनी पहले कभी रही होगी या रहेगी क्योंकि मैं तो कोई ऐसा विचारक नहीं हूँ जो अपना जीवन इसी प्रश्न को हल करने में बिताकर और संसार को और उलझा कर चले गए (गए भी कि नहीं गए इसका भी किसी को पता नहीं). परन्तु, इस सवाल को सोच सोच कर समय बीतता जा रहा है, कहीं सुबह तो कहीं शाम होती जाती है, लगता है कि समय ही है जो मुझे और औरों को भी अपने साथ खींचता चल रहा है. परन्तु वो भी क्यों चल रहा है शायद उसे भी मालूम न हो.

इसलिए इस संसार में यदि सुखी रहना है तो खाओ (खाने के लिए खाना चाहिए, खाना पाने के लिए प्रयास, कर्म और समय) और सोओ (सोने के लिए चैन चाहिए, चैन के लिए विचार शून्यता होनी चाहिए वरना तो कबीर कि तरह रोते-रोते ही संसार में रहो), रहना तो तब भी है और अब भी है. आपको कैसे रहना है और कैसे नहीं रहना यह भी कहाँ वश में है, हाँ विचार शून्यता के लिए प्रयास कर सकते हैं आज भी और पहले भी विचारशून्यता उत्पन्न करने के लिए संसार में अनगिनत प्रयास हुए हैं दवा-गोली की तलाश हुई है, और कितनी ही आज संसार में उपलभ्ध भी हैं, विचारशून्यता इस मानविक संसार को चलते रहने लिए एक परम आवश्यक औषधि है. इस संसार में जो विचारशून्य हो गया उसने परमतत्व, या कहो शांति को प्राप्त कर लिया जो विचार करने में उलझ गया वो उलझ ही गया. संसार एक बहती हुई धारा, या हिलोरे खाते समुद्र, या स्थिर खड़े पहाड़ों, बहती हुई हवाओं में जीवों का जीते जाने का नाम है, इसमें जब कुछ लोग मुंह उठाकर क्यूँ, कहाँ, कैसे, कब, किसलिए जैसे सवाल करते हैं तब जो हलचल या फिर तरंग उत्पन्न होती है वाल्तेयर जैसे लोग उसे जीना कहते हैं, कबीर उसे रोना कहते हैं, नेता उसे विद्रोह कहते हैं, धार्मिक या धर्मग्रन्थ  उसे नास्तिकता कहते हैं, सवाल करने वाले अपने आप को विचारक और दार्शनिक माने लगते हैं और फिर इसी संघर्ष में दुनिया  चलती है, रूकती है, बहकती है, चहकती है, महकती है, और भी पता नहीं क्या क्या.  तो क्या यही सब होने का नाम ज़िन्दगी है?  

शांति क्या है, क्या विचारशून्यात ही शांति है? विचारशून्यता उत्पन्न करने के लिए हमेशा प्रयास या दवा-गोली की ही जरूरत हो ऐसा भी नहीं है, नींद आती है तो अपने साथ विचारशून्यता लेकर आती है और और शांत  होते हैं तब हम सो जाते हैं, जब विचार करते-करते थक जाते हैं, या काम करते करते थक जाते हैं तब भी नींद आती है, परन्तु बग़ैर गोली के नींद आती है थकने के बाद ही. थक जाना ही शायद शांति है या फिर अंत, जब हमारा शरीर जीकर थक जाता है, घिंस जाता है और हलचल बंद करके सारी मशीनरी बंद करके शांत हो जाता है उसका नाम मृत्यु है अर्थात मृत्यु ही अंतिम शांति है. कुछ विचारक कहते हैं कि अतृप्त मृत्यु को प्राप्त करके भी शांति नहीं पाते अर्थात अतृप्त और तृप्त का भी एक संसार है. तृप्ति क्या है? विचारहीन होना या फिर खा पी कर सो जाना! तृप्ति क्या शारीरिक है या मानसिक? कहते हैं मस्तिष्क से मानसिकता आती है, तो क्या मष्तिष्क शरीर से अलग है? तब क्या मानसिकता शारीरिक नहीं है? अगर मष्तिष्क शरीर से अलग है तो शरीर की मृत्यु के बाद भी क्या मस्तिष्क जीता है? विज्ञान तो कहता है कि ह्रदय का स्पंदन रुकने बाद सबसे पहले मरने वाला मस्तिष्क ही होता है. तब क्या विज्ञान भी झांसा है, लगता ज़िन्दगी एक झांसा ही है या फिर झांसे का एहसास. ये सब उलझने और और उलझाने वाले विचार ही शायद जीने का कारण हैं.

Who?

 Who?

    Who was I? Who am I? Who will I be? These are the questions that made me ponder many nights spent awake. I failed every night and many days too, and I tried to avoid these questions during the daylight, but at night, they keep haunting me. Though I love my old clothes, I don't want to be in an aged, sick, weak, and old body. I hardly believe in God or Gods, but I prayed for my death more than anything worldly, even more than for life or to live long. I couldn't understand why I did this, but I thought of many ways to end the game at various points in life. I never felt defeated in life (maybe it's a half-truth), and I always loved to be a fighter, probably because I never had faith in good or bad life, I never understood the meaning of winning and losing, and I never got convinced of truth or untruth. I fought for the cause with all my wits and wisdom and never feared loss. I know people may not believe me, but this was, and this is, the reality of my life. Sometimes I think that I either loved anything or anyone in my life, and I find myself lost in the puzzle—it’s a maze I could never solve. Was I selfish? Am I selfish? How can I know? Only others, those who are or were near me all my life, can assess that; however, as a person, I consider myself selfish for certain goals, and selfless for myself. I never feared pain, heartaches, fatal accidents, or serious diseases, and remained cruel to myself because I never found my life too useful for the world or humanity. Now, after retirement, this feeling is growing stronger and stronger—that I am getting a useless body on the earth, a selfish body dwelling on the earth to live longer. Though to live longer a unproductive life is against my wish, I don't want to end the game because I consider that the play that I have not started or written, why should I end that or stop playing. Being on the stage without your wish is certainly not going to attract the audience, but who knows that this may be a real role for me on the stage.

    Life, a play, on the stage of the vanishing world, the momentary bubble in the turbulent stream, and unimaginably tiny in the universe, should not be a puzzle in an already puzzling world, but it is. The puzzle has been claimed to have solutions provided by many religions, semi-gods, demi-gods, and the godly people; they are either unreachable, imaginary, bluffs, or tools to control the lives of simple people, but people like me, with complex and perplex thinking, are still ignorant or against all such solutions and answers to life. The only solution that seems feasible to me for life questions is understanding and knowing the soul. If someone can code the soul, and make it public (in all probability, if someone does, it will get rapidly patented, to be the God or the Shaitaan), only then can lives like mine be benefited. The next question may be more serious: if the soul is there, is there a supersoul (the God), is the soul there in all living and nonliving, in every particle of the universe, is it an energy packet of a different size or of uniform size, how does it adjust to live in all different shapes and sizes, is it a all fit tool or jack for all or something else, realy at present rarely anyone knows. Can we see and know the soul after death? Many have likely died in search of the truth, and many more will in the future, but the majority of us die and will die without pondering on the puzzle.

Monday, December 15, 2025

मीठा गीत

 मीठा गीत


जब मन में उपजे होंगे द्वंद, 
शब्द तभी बन पाए होंगे छंद .
जब हृदय कांपा होगा, जैसे लगी हुई हो शीत,
तब कम्पित ओंठों से निकला होगा मीठा गीत .
जब सविता ने उगली होंगी काली किरणें, 
तब कविता के फूटे होंगे नन्हे-नन्हे झरने .

बुढ़ापा- जियो और जब तक जियो, शान से जिओ

 बुढ़ापा- जियो और जब तक जियो, शान से जिओ

यूं तो 23000 से कुछ सीजल रातें आकर चली गई,
पर किसी ने नहीं की थी बातें इतनी क्रूर,
बहुत थी उनमें घने अंधेरों में लिपटी हुई, और रोशनी के किनारो से बहुत दूर,
और लगभग उतनी ही थी दमकती चांदनी में नहाई, मदहोश जवानी के नशे में चूर, 
बातें वे भी करती थी अक्सर बहुत देर देर तक साफ-साफ भले ही दूर-दूर ।
पर इस कटीली रात की बातें थी कुछ फुसफुसाहट जैसी परंतु पास पास।
आज सुबह भी उतनी सुहानी नहीं थी, उदास थी और झीनी रोशनी के साथ-साथ ।
वैसे तो सूरज निकल रहा था पर कुछ धुंधलका सा था मेरे आस-पास ।
चिड़ियों की चहचहाट लग रही थी जैसे आ रही हो यहीं दरवाजे के पीछे से ।
मेरी सुबह लड़खड़ा रही थी और फिसल रही थी रेत मुट्ठी से ।
दांत कह रहे थे किसकिसाकर कि अब अखरोट तोड़ने में डर लगता है ।
ठीक से याद नहीं आ रहा क्या कह रही थी भला गई रात,
कुछ अस्पष्ट सी, और फुसफुसाकर  कि भोज तुम अब बुढ़ाने लगे हो ।
सच में विश्वास तो नहीं होता पर फिर सोचता हूं ऐसा उसने क्यों कहा जो कभी कहा नहीं था पहले ।
दौड़ने की इच्छा तो अभी भी होती है पहले की तरह और दौड़ता भी हूं,
परंतु दौड़ने के बाद होता है कुछ दर्द का एहसास घुटनों में जो पहले नहीं था ।
कुछ दूर दौड़ने के बाद बैठने को जी चाहता है और मैं बैठा रहता हूं,
अक्सर कई घंटे तक किसी गंभीर विचार में या कभी-कभी यूं ही बिना किसी वजह ।
छोले चावल में अब पहले जैसा स्वाद ही नहीं रहा,
 लोग कहते हैं कि आजकल फसलों में बहुत पेस्टिसाइड और खाद डाले जाते हैं जिन्होंने फसलों को बेस्वाद कर दिया है । कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी जीभ पर बैठी हुई स्वाद कणिकायें स्वाद से भटकने लगी हैं, 
क्योंकि अब मूंग की दाल में, दलिए और खिचड़ी में, वह स्वाद आने लगा है जो पहले कभी नहीं था ।
अक्सर दांत भी नाराज हो जाते हैं अगर मैं शाम को ब्रश करना भूल जाऊं खाने के बाद, 
कुलबुलाने लगते हैं सुबह-सुबह जैसे नाराज हों बहुत बुरी तरह रात से ।
पहले तो गन्ना चूसने में गन्ने में नूनमेख नहीं निकालते थे कभी,  शायद अब किसानों ने खाने लायक गन्ना ही उगाना बंद कर दिया है ।
गुङ खाना अच्छा तो अभी भी बहुत लगता है,
परंतु कई दोस्त है जो गुड़ खाने के नुकसान अक्सर बताने लगते हैं ।
दोस्त और अपने बच्चे पहले तो कभी ऐसा नहीं करते थे,
परंतु अब साल में कई बार सलाह देते हैं वार्षिक और अर्धवार्षिक स्वास्थ्य जांच की ।
कोई भी नहीं है ऐसा जिसमें कोई कमी ना हो परंतु डरता हूं वार्षिक स्वास्थ्य जांच से क्योंकि,
 कई दोस्त हैं जो जांच के बाद डॉक्टर के चक्कर अक्सर लगाने लगे हैं ।
वैसे तो नाम मेरे पहले भी याद नहीं रहते थे, शायद मैं उनके नाम पूछता ही नहीं था, 
परंतु अब तो कई बार पूंछता हूं यह आजमाने के लिए कि मेरे याद कुछ रहता भी है कि नहीं । 
और जब कभी कभार किसी का नाम मेरे याद नहीं आता तब परेशान होता हूं, 
भूल जाता हूं कि नाम याद रखना मेरी आदत नहीं है और सोचने लगता हूं कि कहानी कुछ और तो नहीं ।
आजकल आसमान में तारे कुछ कम ही नजर आते हैं, लोग कहते हैं की प्रदूषण बहुत है, हवा साफ नहीं है, आसमान गंदा है, और नजारे धुंधलाने लगे हैं, 
कहीं ऐसा तो नहीं मेरी नजर कमजोर होने लगी है और मेरे चश्मे का नंबर बदलने को कह रही है ।
मुझे शोर में भी कोई फर्क नहीं पड़ता आराम से अपना काम करता हूं,
मुझे शोर में रहने की आदत हो गई है या फिर मेरे कान के दरवाजे धीरे-धीरे बंद होने लगे हैं ।
मैं तो कब से सिर्फ अपनी और अपनी ही बात सुनता रहा हूं और सुनाता रहा हूं ।
मुझे नहीं लगता कि मैंने अपनी बोलने की आदत में कोई परिवर्तन किया है, 
परंतु श्रीमती जी अक्सर बड़बड़ाती रहती है कि मैं बहुत तेज बोलने लगा लगा हूं ।
आवाज तो मेरी पहले भी बुलंद थी परंतु जाने क्यों लोग इसे अब बहरेपन की निशानी बताने लगे हैं ।
शायद मेरे शब्द खोखले दांतों को शंख समझ कर बजाते हैं,
और मेरे स्पंदित शब्दों को खुद ही उलझे हुए लोग बुढ़ापे की निशानी बताते हैं ।
लगता है कुछ बात तो है अब बदली हुई, पहले अक्सर कमर दर्द नहीं करती थी परंतु अब अक्सर करती है, 
मैंने सुना है कई लोगों को कहते हुए कि जाड़े में पुरानी चोटें अक्सर दर्द करने लगती है, शायद ऐसा ही है ।
चोटें तो बहुत लगी हैं मुझे बचपन में, कई बार पेड़ से भी गिरा हूं, 
परंतु इन चोटों ने पहले इतने दर्द नहीं दिए शायद अब ये पहले से ज्यादा पुरानी हो गई हैं ।
या फिर आजकल जाङा कुछ ज्यादा ही पङने लगा है साल के इन दिनों दिनों मैं पहले एक स्वेटर ही पहना था अब जैकेट में भी  जाङा लगने लगा है ।
चलो छोड़ो लोगों की बातें अभी कहां से आएगा बुढ़ापा,
चलो छोड़ो रात की बातें अभी तो मंजिल दूर है । 
मैं रिटायर हो गया हूं दुनिया इसी गफलत में है पर शायद सच उन्हें पता नहीं,
असलियत तो यह है की सरकार ने मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए मुझे रिटायर कर दिया है ।
कभी-कभी लगता है मैं कुछ सनकी हो गया हूं फालतू की बातें सोचता रहता हूं,
शायद इसलिए के रिटायरमेंट के बाद करने के लिए कुछ ज्यादा है ही नहीं ।
चलो छोड़ो इन फालतू बातों को, आओ अब घूमने चलें,
मौज और मस्ती करें, अभी तो दिन आए हैं मौज मस्ती करने के,
मुफ्त में लोग मेरी कुछ नई हरकतों को बुढ़ापा बताने के लिए चले हैं।
वैसे तो यह सच नहीं है पर अगर मन को मना भी लूं कि बुढ़ापा आने लगा है,
तब भी क्या दुनिया में सभी तो बुड्ढे नहीं होते हैं, किसी-किसी को मिलती है यह नियामत भी ।
और दुनिया से जाना को तो सभी को है, जवान ही चले जाओ या फिर बूढ़े होकर जाओ ।
 परंतु दोस्तों, जिंदगी कभी बूढी नहीं होती, इसलिए जिंदगी को जियो भरपूर,
सुख में दुख और दुख में सुख ढूंढते रहना ही जिंदगी है, जियो और जब तक जियो, शान से जिओ ।

Thursday, August 14, 2025

मेरी हिंदी अकविता

ज्योतिषी 

इक बरहमन ने कहा है कि, लाला ये साल भारी है, 
हर इक काम में आएगी मुश्किल, ना कोई दोस्त रहेगा अपना, 
और अपने भी गैर हो जाएंगे, 
ग्रहों का कुछ फेर ऐसा है कि कहीं फंसने कि बारी है. 
ना कोई रात होगी चांदनी, ना सुनहरी चमकेगा सूरज, 
हर तरफ होगा आलमे-बेखुदी,  दफा हो जाएंगी सारी खुशियां, 
चाँद-सूरज पे राहु भारी है. 
डराने को तो खूब डरा गया है बरहमन, दुःखों से बचने का हिसाब बता गया है बरहमन, 
हिसाब सुनके थरथराता है कलेजा, क्या-क्या और बाकी है अभी, 
ये दौर तो अरसे से जारी है. 
सेहत पे बन आएगी अबके बरस, बीवी और बच्चे भी हैरां होंगे, 
सम्हल कर चलने कि हिदायत है, क्या से क्या हो जाये जाने, 
शनि की साढ़ेसाती भी जारी है. 
भला हो बरहमन तेरा, क्या-क्या ना कह दिया तूने, 
इसके अलावा भी बचा कुछ और था मुंह में, जो तूने कह दिया, 
बाप गुजरे तो बीता एक अरसा , इस बार चाचे कि बारी है. 
तूने तो मार डाला मुझे मौत से पहले बरहमन, पर जीने की आरजू अभी भी है, 
जो भी होगा देखा जाएगा जनाब, 
सभी गर्दोगुबार और हर मुसीबत के जानिब, ये ख्याल भारी है. 


एक सुन्दर सपना 
नहीं कोई हो सकता इससे सुन्दर सपना, 
जब तुमने बाँहों मैं भरकर मुझे कहा था अपना. 
मैं सपने जीता रहा जिंदगी में दूर तक, पर जाग गया हूँ आज. 
आँख खुली जब कानों में एक राज घुला, और तुमने बोला राज. 
कितनी सूखी, कमजोर कड़ी सी, तुम बाँहों में निर्वस्त्र पड़ी थी, 
ओंठो पर जब ओंठ धरे थे, इक रसधारा फुट पड़ी थी. 
कहीं से तब आवाज थी आई, सच थी तुम, या ये तन्हाई. 
सचमुच थी तुम ही, या फिर थी तुम इक सुन्दर सपना. 
मेरा सपना सुन्दर सपना था, पर कहीं कहीं तो अपना था. 
स्वारथ कि बूंदों में घुलकर, लालच कि किरणों में फंसकर, 
सपने का अस्तित्व ढूँढना मुश्किल है, 
नामुमकिन है उसको छू पाना, 
सपना तो आखिर सपना था, वो कब कहाँ पर अपना था, 
फिर भी तो सपना अपना था. 

ईश्वर 
आज सुनता हूँ तेरा नाम जब भी, बू आती है परायेपन की. 
जितना सोचता हूँ तुझे, कमजोर होता जाता हूँ, बाली की तरह. 
ठीक है तू अपना नहीं, पर इतना तो न सता कि बेगाना भी ना रहूं. 
सब जानता हूँ मैं, और तू भी, दुश्मनो से रिश्वत मोटी खाई है तूने, 
पर अपनी बेरुखी को इतना नो जता, कि एक अफसाना भी न रहूं. 
सब कुछ तो कह दिया तुमसे, अब कहने को क्या रहा बाकी, 
इतना भी बार बार ना बता मुझे, कि तुझसे अनजाना भी ना रहूं. 

रात और दिन, सुबह और शाम. 
सपने ही सपने हैं आँखों में मेरी, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 
अपने ही अपने हैं बातों में मेरी, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 
वक्त ने जो ठोकर है मारी, 
और किस्मत टुकड़े टुकड़े हो गई, 
मैं चुनता रहता हूँ वही टुकड़े, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 
जिंदगी के बदरंग से कैनवास पर, 
सब रंग फीके पड़ गए, 
ढूंढता फिरता हूँ रंग अब बाजार में, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 
लाया था पिछली बार रंग जिस दूकान से, 
 जगह भी पता है और वाकिफ भी हूँ उसके नाम से, 
पहुंचता कभी नहीं बस चलता रहता हूँ, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 
छुपाने को अपनी नाकामियां, बोलता हूँ झूठ भी, 
कभी ढूंढता नहीं, 
पर आ जाते हैं बहाने हारने के खुद ही मेरी जुबान पर. 
रुकता नहीं कभी भी, बस चलता ही रहता हूँ, 
रात और दिन, सुबह और शाम. 

मेरी जिंदगी 
मेरी जिंदगी भी क्या है, एक कटी पतंग है. 
कभी झाड़ पर अटकी हुई, कभी बादलों के संग है. 
कभी बारिसों में हंसती हुई, कभी बसंत में बे रंग है. 
कभी तूफानों से लड़ती हुई, कभी हारी हुई सी जंग है. 
कभी नमूना बन गई, कभी हर तरह बेढंग है. 
कभी जीतने का हौंसला है, कभी हारने से तंग है. 
कभी बड़ी महंगी बिकी बाजार में, 
और जतन से सजाया खरीदार ने, 
फिर उड़ गई, वो कट गई, झाड़ पर अटक गई, 
राह से भटक गई, डोर टूटी लटक गई, 
 कहाँ गई, पता नहीं, आज अपनी गुमनामी के संग है. 
कभी बादलों से बात थी, हर रात सुहानी रात थी, 
सब किसी के साथ थी, अनाथों की भी नाथ थी, 
 एक आंधी ऐसी चली, और आग ऐसी जली, 
 दिन में अँधेरा छा गया, आज देखो सुबह भी बदरंग है. 
फिर सवेरा आएगा, तिमिर सब छंट जाएगा, 
और पपीहा जाएगा, जिंदगी तो जिंदगी है, हर रोज नई जंग है. 

बुझी हुई सी लौ 
एक अरसा हुआ आग बुझे,
फिर क्यों कुरेदते हो खाक बार-बार चिंगारी की तलाश में, 
बड़े वक्त तक इंतेजार किया था तेरा 
और वो दफ़न हो गई थी कभी तेरे आने की आस में. 
यूँ तो कभी रास आया न सच के साथ-साथ चलना मुझे, 
पर चलता गया खुद को पाने की तलाश में, 
ना तो तुम मिले मुझे मेरे चैन, 
ना ही मैं बैठ पाया दो पल आराम से तुझे पाने की आस में. 
किनारा तो नजर आया था बार बार, 
पर मैं रुक ना सका तेरे पाने की आस में, 
मैं खोता चला गया सब चैन और आराम 
जो नहीं मिला उसे पाने की प्यास में. 

यात्रा 
मौत निःशब्द कब आती है, 
अक्सर सिसकियों के कई बाँध तोड़ जाती है. 
वर्षों तक सुनाई देती है उसकी आहट, 
अपने पीछे कई तूफ़ान छोड़ जाती है. 
वो नदी जो बहती है हमेशा अपनी हद में, 
कई बार किनारों के निशान छोड़ जाती है. 
नन्ही बून्द भी जाती है जब जहान से, 
वीरानों में, अंगारों पर भी अपने निशान छोड़ जाती है. 
तू तो आदम की है पैदाइस, 
 क्या पैदा हुआ जो बिखर गया, 
कुछ निशान छोड़ बाकी, व
र्ना दुनिया तो आती है और चली जाती है. 

भ्रम और भगवान् 
भगवान् तुम्हारी दुनिया में, 
दुःख है क्यूं, संताप है क्यूं , 
सच पर भारी झूठ है क्यूं ,
और पुण्य पर भारी पाप है क्यूं. 
जब सब को बनाया है तुमने,
फिर जात है क्यूं और पात है क्यूं , 
जब कण कण में तू ही समाया है,
फिर मेरे मन में पाप है क्यूं. 
जब संतोष कभी मिलना ही नहीं, 
तृप्ति की फिर आस ही क्यूं. 
जब साथ तुम्हे देना ही नहीं, 
फिर हरदम मेरे पास है क्यूं. 
जब पेट कभी भरता ही नहीं, 
फिर भूख है क्यूं और प्यास है क्यूं. 
जब मन को भटकते ही रहना था, 
फिर साधू वेश सन्यास है क्यूं. 
जब जग को रखना अँधियारा था, 
फिर तूने दी थी आँख ही क्यूं. 
जब दर्द तुझे सुनना ही नहीं था , 
फिर जुबां ये फ़रियाद ही क्यूं. 
जब खुशिया मेरी भाती  ही नहीं, 
फिर तूने बनाये फूल ही क्यूं और पात ही क्यूं. 
जब जल में जहर मिला देना था, 
फिर मन में जगाई प्यास ही क्यूं. 
जब हरदम दुःख ही दुःख देने थे, 
फिर दिन है क्यूं और रात है क्यूं. 
जब करना झूठा बंटवारा ही था, 
फिर तूने बनाई नाप ही क्यूं. 
जब हर आस पे ओले ही पड़ने थे, 
फिर तूने दी थी आस ही क्यूं. 

मेरा घर 
जिंदगी मेरे घर आना, 
 यहाँ पे हवाओं के झूले पड़े हैं, 
स्वागत में तेरे लताओं से बनाये हैं वंदनवार. 
घर में कोई ना कुण्डी लगी है, ना ताला जड़ा है, 
स्वागत में तेरे,
मैं गिराए खड़ा हूँ सारे दरोदीवार. 
जिंदगी मेरे घर आना, 
 आहट में तेरी मैं कब से खड़ा हूँ 
गला पड़ गया है गा-गा मल्हार. 

राम तेरे देश में
देशभक्त क्यों राजद्रोही कह फांसी लटकाये जाते हैं. 
देशद्रोहियों के माथे नित क्यों तिलक लगाए जाते हैं. 
देश पे मरने वालों को क्यों देश-निकाला मिलता है, 
देश के कर्णाधारों के दिल क्यों पत्थर के बनाये जाते हैं. 
सच पर चलने वालों को क्यूं आग में जलना पड़ता है. 
झूठे और मक्कारों को क्यूं नित जूस पिलाये जाते हैं. 
सच्चे लाल कमरों पर क्यूं जुर्म का डंडा चलता है. 
चोरों और लुटेरों को क्यूं नित हार पहनाये जाते हैं. 
मेहनतकश क्यूं भूखा है, हथेली पे टुकड़ा रूखा है. 
कर्महीन और ज्ञानहीन को क्यों छप्पन भोग लगाए जाते हैं. 
नीम क्यों काटा जाता है और क्यूं कीकर को सींचा जाता है. 
बेटी क्यों मारी जाती है और क्यूं पूत खिलाये जाते हैं. 
क्यूं देश की सीमा सूनी है, और चोर बुलाये जाते हैं. 
डाँकू और लुटेरों के घर क्यों चौंकीदार बचाते हैं . 
क्यूं जनता की राहें अँधेरी हैं, क्यूं मेहनत का फल अब फाका है. 
दिन में दीप जला-जला क्यों फीते कटवाए जाते हैं. 
खलनायक क्यूं जननायक बन हमें रोज भरमाते हैं. 
राम! तुम भी बिलकुल मेरे जैसे हो, 
बातों के गाल बजाते हो, 
फिर तेरे इधर उधर जाने पर क्यूं रस्ते रुकवाए जाते हैं. 
लगता है तू तो अँधा है, ठोकर खाने से डरता है, 
वर्ना तेरे मंदिर में क्यूं नित चीर भी लुटते जाते हैं. 
जा देख ली तेरी भगवानी भी, 
तुझ को जब ठोकर लगती है, नए भगवान् बनाये जाते हैं.

Friday, July 18, 2025

What is an IT Cell, and how can you save yourself from its effects?

 What is the IT cell? It is a misinformation group of politically motivated people using a psychological fact: "When those in your social circle share misinformation, you are more likely to believe it and share it. Misinformation multiplies, and science denial grows." Politicians use this fact to keep people blind to the facts. Every political party has created such groups, called IT Cells. We must be careful of these groups, and we often fail to recognize when we fall into their trap. My goal is never to criticize or insult anyone, but I always try to add some humor to scientific explanations so they aren’t boring, as science can sometimes seem.

How can you protect yourself from falling prey to the IT Cell?
1. Learn to slow down and observe your quick, intuitive responses—"System 1 thinking." Instead, activate the rational, analytical part of your mind—"System 2"—and ask yourself, "How do I know this is true? Is it plausible? Why do I think it is true?" Then do some fact-checking. Don’t accept information at face value if it confirms what you already believe; it is called Confirmation Bias in epidemiology.
2. Some people see things dualistically: there’s always a clear right or wrong. But scientists view tentativeness as a core part of their discipline. They understand that scientific claims can change, and today’s scientific knowledge may not stay true tomorrow. Journalists sometimes exaggerate this by presenting "both sides” of settled scientific agreements, trying to persuade readers that science is more uncertain than it actually is, turning balance into bias, known as observer bias.
3. Understand that others—or even yourself—may operate under misguided beliefs about science. We can help ourselves by adopting a scientific attitude—being open to new evidence and willing to change our minds.
You might think that how you interpret a simple graph depends on your socio-political views. But when you look at the same chart again, you might be surprised. There’s an unconscious bias toward your preferred interpretation, and honestly, I often struggle with this myself.
4. Recognize the role emotions play in decisions about science. You might react strongly to a story about stem cells used to develop Parkinson’s treatments. Ask yourself: Are you overly hopeful because you have a loved one in the early stages of the disease? Or are you rejecting a potentially lifesaving treatment because of your feelings? Feelings shouldn’t be separated from how you think about science. Instead, understand that emotions are fully integrated into how we think and learn about science. That is emotional bias.
5. We often hold multiple social identities—like mother, grandmother, or friend—and each one influences our decisions. So, try to listen more and act less, but act decisively and at the right moment. When one identity blocks your acceptance of scientific facts, use another identity to help create a connection.

Hope I haven't made this too boring.